Abbu Khan Ki Bakri – अब्बू खान की बकरी ( चांदनी ) – डॉ जाकिर हुसैन – Best Story 2023

यह कहानी है  ( Abbu Khan Ki Bakri ) – अब्बू खान की बकरी के बारे में जिसका नाम चांदनी था। इस कहानी को लिखा है डॉ जाकिर हुसैन जी ने।

कहानी – Abbu Khan Ki Bakri – अब्बू खान की बकरी ( चांदनी )

एक गावं में एक मिया रहते थे जिनका नाम था अब्बू खान था। उन्हें बकरी पालने का बहुत शौख था। वे बहुत गरीब थे बकरिया पाल के उनसे जो दूध मिलता उसी को बेच के अपना जीवन व्यापन करते थे।

बुजुर्ग होने के कारण वे ज्यादा बकरियों का ध्यान नहीं रख पाते थे, इसलिए वो बस एक या दो ही बकरी ही पालते थे। अब्बू खान बहुत बदनसीब थे, क्यों की उनके गावं के पास ही एक पहाड़ी थी और उस पहाड़ी पे एक भेड़िया रहता था।

अब्बू खान की बकरिया कभी न कभी रस्सी तोड़ कर उस पहाड़ी पे भाग जाया करती थी। और उन बकरियों को वो भेड़िया मार कर खा जाता था। अब्बू खान के लाख कोशिश करने के बाद भी वो बकरिया उनके पास नहीं रूकती थी वो अक्सर उस पहाड़ी पे भाग जाया करती थी।

ना ही उन बकरियों को अब्बू खान का प्यार दिखता था, और ना ही उनके भेड़िये  से अपनी मौत का डर। अब्बू खान हमेशा ये सोच के परेशान रहते थे की आखिर ऐसी क्या कमी है मेरे प्यार में, मै इन्हे इतने प्यार से रखता हु। बढ़िया बढ़िया खाना देता हु। फिर भी ये बकरिया उस पहाड़ पे भाग जाती है।

ऐसे ही दिन बीतते जाते, अब्बू खान की बकरिया उस पहाड़ी पे भाग जाती और भेड़िया उन्हें मार के खा जाता। अब्बू खान फिर दूसरी बकरी खरीद के लाते और फिर उन बकरियों के साथ भी यही सिलसिला चलता रहता।

एक एक कर के जब अब्बू खान की बहुत सारी बकरी उस पहाड़ी की तरफ भाग गई तो अब्बू खान बहुत उदास हो गए और अब बकरी पालने का ख्याल अपने दिमाग से निकाल दिए।

कुछ दिन तो ठीक बीत गया पर अब्बू खान को बकरियों के साथ रहने की आदत लग चुकी थी। इसलिए वो अब अकेले रह नहीं पा रहे थे। जब उनसे रहा नहीं गया, तो उन्होंने इस बार एक बकरी के बच्चे को अपने घर ले आये।

अब्बू खान ने सोचा था की इस बार बकरी का बच्चा लाऊंगा। वो मेरे साथ बचपन से ही रहेगी, तो शायद हिल मिल जाये तो मुझे छोड़कर उस पहाड़ी में कभी नहीं जाएगी।

यह बकरी जितनी देखने में सुन्दर थी, उतनी ही अपने स्वभाव में भी अच्छी थी। हमेशा अब्बू खान के आसपास ही घूमा करती थी। उनके साथ पूरा दिन खेलती रहती। अब्बू खान भी उस बकरी से बहुत प्यार करते थे और दिन भर उससे बाते किया करते रहते।

अब्बू खान ने इस बकरी का नाम चांदनी रखा था। और जब चांदनी बड़ी होने लगी तब अब्बू खान के घर के पास ही खेत में उसे एक रस्सी से बांधना चालू कर दिया। और रस्सी इतनी बड़ी थी की वो बकरी जब चाहे कही भी घूम ले। अब अब्बू खान को ये यकीन हो गया की ये बकरी अब कभी उनके पास से नहीं भागेगी।

पर अब्बू खान का ये यकीन जल्दी की टूट गया। क्यों की इंसान हो या जानवर हर किसी को आजादी चाहिए। एक दिन सुबह सुबह जब सूरज निकाल ही रहा था। तब चांदनी ने उस पहाड़ की तरफ देखा और कहा वाह कितना सुन्दर नजारा है।

काश मै भी उस पहाड़ी पे रहती इस सुन्दर से नज़ारे को और पास से देखने के लिए। उस पहाड़ी पे कितनी सुन्दर सुन्दर चोटिया है काश मै उन चोटियों में दौड़ती वहा उछलती कितना ही हसीन पल होता। और यहाँ देखो दिन भर गले में रस्सी लटकाये घूमते रहो। अपने इच्छा अनुसार अपनी जिंदगी भी नहीं जी सकते।

अब्बू खान की बकरी अब पहले जैसे नहीं रही। ना ही अब्बू खान के साथ ज्यादा खेलती थी ना ही वो पहले की तरह चंचल स्वाभाव की थी। बस दिन भर पहाड़ी की तरफ मुँह कर के खड़ी रहती  और उन चोटियों के बारे में सोचती रहती की कब वहा जाने का मौका मिले।

एक दिन अब्बू खान जब चांदनी को खाना देने गए तो चांदनी ने खाना खाने से मना कर दिया, और अपना मुँह फेर के कहा मिया मुझे अब यहाँ अच्छा नहीं लगता मुझे उस सामने वाले पहाड़ की छोटी पे जाना है। तुम मेरे रस्सी खोल दो और मुझे वहां जाने दो।

अब्बू खान, चांदनी के मुँह से इतना सुनते ही वही जमीन पे बैठ गए, और उदास स्वर में पुछा क्या हुआ, अब तू भी मुझे छोड़ के जाना चाहती है क्या ? मेरे प्यार में कोई कमी रह गई हो तो बता मुझे। क्या ? मै तुझे अच्छा खाना नहीं देता। क्या ? मै तेरी अच्छे से देखभाल नहीं करता। तुझे यहाँ मेरे साथ रहने में क्या परेशानी है।

चांदनी ने जवाब दिया। अरे नहीं मुझे यहाँ सब कुछ मिलता है और आप बहुत प्यार से भी रखते हो मुझे। पर अब मै आजाद होना चाहती हु। मेरा यहाँ रस्सी से बंधे हुए दम घुटता है अब मै उन पहाड़ियों में चैन से घूमना चाहती हु। मुझे आजाद कर दो।

अब्बू खान ने कहा तुझे पता भी वहां उस पहाड़ी पे खूंखार भेड़िया रहता है जो भी बकरी उस पहाड़ पे जाती है वो उसे मार के खा जाता है। जब वो भेड़िया तेरे सामने आएगा तो तू क्या करेगी। चांदनी ने जवाब दिया, अल्लाह ने मुझे दो सींग दिए है उसी से भेड़िये को मार डालूंगी।

अब्बू खान ने कहा हां, जैसे की तेरे सींग का असर उस भेड़िये पे होगा। तेरे से पहले एक और बकरी थी जो बहुत बहादुर थी। वो भी तेरी तरह आजाद होने के लिए उस पहाड़ की छोटी पे चली गई वहां उसने भेड़िये से पूरी रात मुकाबला किया पर वो खूंखार भेड़िया सुबह होने से पहले ही उसे जान से मार कर खा गया।

चांदनी ने कहा। हां तो मै भी बहुत बहादुर हु उस भेड़िये को तो एक ही बार में मार डालूंगी मै। बस तुम मेरी रस्सी खोल दो और अब मुझे आजाद कर दो।

चांदनी की बात सुन कर अब्बू खान गुस्साते हुए बोले, तेरे कहने से तुझे आजाद कर दू, और मरने के लिए उस पहाड़ी पे जाने दू, ऐसा तो मै कभी नहीं होने दूंगा। चाहे तू कुछ भी कहे मै तुझे वहां मरने के लिए नहीं जाने दूंगा। इतना कह कर अब्बू खान चांदनी को एक कोठरी में बंद कर दिए।

कोठरी का दरवाजा तो लगा दिए थे पर गुस्से में उनको खिड़की बंद करना याद नहीं रहा। इधर अब्बू खान कोठरी से बहार निकले, उधर चांदनी भी खिड़की से बहार निकल गई। बहार निकलते ही चांदनी सीधा उस पहाड़ की चोटियों पे पहुंच गई।

वहा पहुंचते ही चांदनी खुशी से झूम उठी। हर तरफ सुन्दर सुन्दर पेड़ लगे हुए थे, ना ही वहा वहा कोई काँटों की बाड़ थी, ना खूटा ना ही रस्सी जो चांदनी को अपने मन मर्जी से कही घूमने से रोक सके। चांदनी कभी इधर उछलती कभी उधर उछलती मानो, जैसे वो स्वर्ग में आ गई हो।

तभी पहाड़ो के नीचे से सीटी की आवाज आनी चालू हो गई। यह आवाज बेचारे अब्बू खान निकाल रहे थे। वह चांदनी को बचाने की आखिरी कोशिश कर रहे थे कि शायद सीटी की आवाज सुनकर चांदनी वापस अब्बू खान के पास आ जाये।

यह आवाज सुन कर चांदनी को एक बार लगा की वो वापस अब्बू खान के पास चली जाये। तभी उसे खूंटा, रस्सी और काँटों की बाड़ याद आ गई, चांदनी ने सोचा वहा जा के गुलामी की जिंदगी से तो बेहतर है की यहाँ आजादी की ही मौत क्यों ना हो जाये।

कुछ देर बाद सीटी की आवाज आनी बंद हो गई। बेचारे अब्बू खान, चांदनी के वापस आने की उम्मीद छोड़कर वापस चले गए तभी, पीछे झाड़ियों से खरकराहट की आवाज सुनाई दी। चांदनी ने पीछे पलट के देखा तो वहा भेड़िया बैठा था।

वो खूंखार बेड़िया, चांदनी को देख कर मुस्कुरा रहा था। और चांदनी से बोला। ओह ! ( Abbu Khan Ki Bakri ) अब्बू खान की बकरी।  बहुत दिनों से अब्बू खान की बकरी खाने का स्वाद मुझे नहीं मिला है। चलो कोई बात नहीं देर से ही सही पर इस बार अब्बू खान ने तो इस बकरी को बहुत खिला पिला के मोटा ताजा कर के मेरे पास भेजा है।

इसे खाने में तो मुझे मजा ही आ जायेगा। इतना कहते हुए वो अपनी लाल लाल जीभ को अपने होंठो पे फेरने लगा। भेड़िये के मुँह से इतना सुनते ही चांदनी को बहुत गुस्सा आया।

उसने सोचा क्यों ना इस भेड़िये को अपनी नुकीली सिंघो से अभी मार डालू। तभी चांदनी ने सोचा की वो एक बकरी है और भेड़िये का मुकाबला नहीं कर सकती। अगर वो भेड़िये से लड़ेगी तो जान से मारी जाएगी।

मगर फिर चांदनी को याद आया की अब्बू खान बता रहे थे उनकी एक बकरी इस भेड़िये से पूरी रात अकेले मुकाबला कि थी। चांदनी  ने सोचा मै इतनी जल्दी हिम्मत नहीं हार सकती, मै भी इस भेड़िये का मुकाबला करुँगी।

अल्लाह ने चाहा तो मै पूरी रात इस भेड़िये से लड़ के शायद इसे हरा दू। अगर मै ऐसा कर लेती हू तो आज के बाद कोई और अब्बू खान कि बकरी ( Abbu Khan Ki Bakri ) इस भेड़िये के हांथो नहीं मरेगी।

फिर चांदनी ने अपना सींघ भेड़िये कि तरफ किया और भेड़िये से मुकाबला करने के लिए सामने खड़ी हो गई। भेड़िया चांदनी को मारने उसकी तरफ बढ़ा, और उस पर हमला कर दिया। चांदनी भी अपने सींघ से भेड़िये को मारने लगी। चांदनी ने भेड़िये पे ऐसे ऐसे हमले किये कि, भेड़िया ही जनता होगा।

चांदनी ने भेड़िये को कइयों बार पीछे धकेल दिया, ऐसा ही लड़ते लड़ते सुबह होने लगी, चांदनी भी अपनी बहादुरी पे खुश हो रही थी कि मैं भी सुबह तक इस भेड़िये का मुकाबला कर लिया, अब आगे जो हो वो अल्लाह कि मर्जी।

चांदनी अब अंतिम समय में और दुगना जोर लगा के भेड़िये पे आक्रमण करने लगी। भेड़िया भी चांदनी के हमले से परेशान हो गया था। तभी भेड़िये ने पूरी ताकत लगा के चांदनी पे हमला किया और उसे दबोच लिया।

देखते ही देखते चांदनी के शरीर से खून निकलने लगा, चांदनी बेसुद हो के जमीन पे गिर गई। फिर भेड़िया, चांदनी को जान से मार कर खा गया।

वही पेड़ पे बैठी चिडियो में बहस होने लगी कि आखिर जीत किसकी हुई। सब कह रही थी कि भेड़िया जीता, पर वही पे एक बूढी चिड़िया नहीं जीत चांदनी की हुई है।

 

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