30+ Best Hindi Stories For Reading – हिंदी कहानियाँ 2023

इस पोस्ट में हम ( Hindi Stories For Reading ) हिंदी कहानिया पढ़ेंगे। शायद आपको पता हो, हिंदी साहित्य का इतिहास बहुत पुराना है।

हमारे देश में लगभग 5000 सालों से भी अधिक का साहित्यिक इतिहास है। हिंदी कहानियों का प्रभाव भारतीय संस्कृति और समाज पर विशेष होता है और ये कहानियां हमें विभिन्न सिद्धांतों और मूल्यों का संदेश देती हैं।

मैं इस पोस्ट में कुछ नई और रोचक हिंदी कहानियों का भी जिक्र करूँगा, जिन्हें आप पढ़कर अपनी जीवन शैली को सुधार सकते हैं। इस पोस्ट से, मैं आशा करता हूँ कि आप भी हिंदी कहानियों के प्रेमी होंगे और उन्हें पढ़ने के लिए उत्साहित होंगे।

इस पोस्ट में कुछ प्रसिद्ध ( Hindi Stories For Reading ) हिंदी कहानियों के बारे में बताऊंगा जो हमारे दिनचर्या में से कुछ अमूल्य ज्ञान देती हैं।

इस विषय पर लेख लिखने से, हम अपने पाठकों को हिंदी साहित्य के बारे में जागरूक करते हुए उन्हें सकारात्मक ढंग से जीवन के साथ जुड़े अहम् ज्ञान प्रदान कर सकते हैं।

1. ठंढी रोटी ( Hindi Stories For Reading )

एक गांव में एक माँ और बेटा रहते थे। माँ का नाम शीला और बेटा ना नाम राजीव था। शीला राजीव को बहुत प्यार करती थी और उसकी पढ़ाई लिखाई, खाना पीना इत्यादि का पूरा ध्यान रखती थी।

शीला जब भी राजीव को खाना देती थी, तब वह कहती थी की बेटा ठंडी रोटी खा लो। राजीव को समझ में नहीं आता था की माँ ऐसा क्यों कहती हैं और वह चुप चाप होकर खाना खा लेता था।

फिर शीला ने उसका विवाह कर दिया, लेकिन वह कुछ कमाता नहीं था। एक दिन शीला किसी काम से बाहर जा रही थी तो जाते समय अपने बहु से कह गयी की जब राजीव आये तो उसको खाना दे देना और खाना देकर कहना की ठंडी रोटी खालो।

राजीव की पत्नी ने उससे वैसे ही कह दिया जैसे शीला कहने को बोली थी। राजीव ने जब वही शब्द अपने पत्नी के मुँह से सुना तो चिढ गया की माँ तो कहती ही हैं, अब ये भी कहना सीख गयी। वह अपने पत्नी पे गुस्सा करते हुए बोला की, बता  – रोटी ठंडी कैसे हुई?  रोटी भी गर्म हैं सब्जी भी गर्म हैं, फिर तू बता इसे ठंडी रोटी क्यों कह रही हैं।

वह बोली की ये तो आपकी माँ जाने। आपकी माँ ने मुझे ऐसा कहने को कहा था, इसलिए मैंने कह दिया। राजीव बोला की ले अपनी रोटी मैं नहीं खाऊंगा, माँ तो कहती ही थी अब तू भी सिख गयी हैं।

शीला जब अपना काम खत्म कर के घर आयी तो अपने बहु से पूछी, बहु राजीव खाना खा लिया क्या? उसने बोला नहीं माँ जी उन्होंने तो भोजन किया ही नहीं, और उल्टा मेरे से नाराज हो गए।

शीला तुरंत अपने बेटे के पास गयी और नाराज होने की कारण पूछी – तब राजीव ने जबाव दिया की देख माँ तू तो रोजाना कहती थी की ठंडी रोटी खा ले और मैं तेरी वो बाते सुन लेता था और चुप चाप खा लेता था। अब ये भी कहना सीख गयी।

रोटी तो गर्म होती हैं माँ। अब तू बता वह रोटी ठंडी कैसे हैं? इस पर शीला ने कहा – अच्छा बेटा अब तू मुझे बता दे की ठंढी रोटी किसे कहते हैं? वह बोला – सुबह के समय बनाई हुई रोटी शाम को ठंढी होती हैं। ऐसे ही एक दिन की बनाई हुई रोटी दूसरे दिन ठंडी होती हैं।

तब शीला बोली – अब तू सोच, तेरे पापा की जो कमाई हैं वह ठंढी बासी रोटी की तरह हैं, गर्म ताजी रोटी तो तब होंगी न जब तू खुद कमाकर लाएगा। राजीव अपनी माँ की बात को समझ गया और उससे माफी मांगते हुए बोला की अब मैं खुद कमाऊंगा और गर्म गर्म रोटी खाऊंगा।

सारांश – इस कहानी से यह शिक्षा मिलती हैं की शादी तभी करना चाहिए जब अपनी पत्नी और अपने पूरे परिवार का पालन-पोषण करने की छमता हो। शादी होने के बाद हमें ठंडी रोटी नहीं खानी चाहिए

2. लालची सेठ ( Hindi Stories For Reading )

एक ललन नाम का गरीब आदमी था। उसको अपनी लड़की का विवाह करना था। उसके पास एक भी पैसा नहीं था, और कही से कमाई भी नहीं नहीं होती थी। तो उसने सोचा की अगर कथा करने से कुछ पैसा आ जायेगा तो काम चल जायेगा।

ऐसा विचार करके उसने एक मंदिर में बैठकर कथा करना शुरू कर दिया। उस गरीब आदमी का कहना ये था की मेरी कथा को कोई सुनने आये चाहे न आये पर भगवान तो मेरी कथा सुनेंगे ही।

उस कथा में हर रोज थोड़े थोड़े लोग आने लगे। और उसी गांव में एक बहुत कंजूस सेठ था। एक दिन वह मंदिर में आया और मंदिर की परिक्रमा करने लगा। उसी समय उसको मंदिर के अंदर से कुछ आवाज सुनाई दिया।

ऐसा लगा की कोई दो लोग आपस में बात कर रहे हैं। सेठ ने उनलोग की बात को कान लगाकर सुना, भगवान राम हनुमान से कह रहे हैं की ये आदमी जो कथा कह रहा वह बहुत गरीब हैं उसके लिए सौ रुपये का प्रबंध कर देना। जिससे उसके लड़की की कन्यादान ठीक से हो जाये।

हनुमान जी ने कहा, ठीक हैं महाराज! इसके लिए सौ रूपये का प्रबंध हो जायेगा। सेठ ने जब इतना सुना तो वह जल्दी से ललन के पास गया और पूछा महाराज कथा में पैसे मिल रहे हैं की नहीं? ललन बोला – लोग तो बहुत कम आते हैं, तो पैसा कहा से मिलेंगे।

सेठ ने बोला अच्छा सुनो आज कथा में जितना पैसा मिलेगा सब मेरे को दे देना, मैं आपको पचास रूपये दे दूंगा। ललन बोला मुझे आपकी  बात समझ नहीं आई, कथा में तो कभी कभी 1 रूपये और कभी 2 रूपये ही मिलते है वो मै आपको दे दू तो आप मुझे 50 रूपये क्यों दोगे।

ललन बोला उसकी चिंता तुम मत करो तुम बस मेरी ये शर्त मान लो मैं भगवान से प्राथना करूँगा की तुम्हे 50 ज़्यदा  मिले जिससे तुम्हे भी फायदा होगा और मुझे भी। ललन ने उसकी शर्त स्वीकार कर लिया।

उसने सोचा की कथा में इतने पैसे तो आएंगे नहीं, पर सेठ जी से तो पचास रुपये मिल ही जायेंगे। पुराने जमाने में पचास रूपये भी बहुत ज्यादा होते थे। इधर सेठ की नियत यह था की हनुमान जी भगवान की आज्ञा का पालन करके इसको सौ रूपये जरूर देंगे और वो सौ रूपये मैं लूंगा और उसमे से पचास रूपये इसको दूंगा और बाकी के पचास रुपये मैं रख लूंगा।

कथा के पूर्ण होने पर सेठ ललन के पास आया। उसको विश्वास था की आज दान में सौ रूपये मिले होंगे। ललन ने कहा की भाई, आज तो दान में बहुत कम पैसे मिले हैं, बस पांच रूपये ही मिले हैं। सेठ बेचारा क्या करें, अपने  वादे के अनुसार ललन को पचास रूपये दे दिया।

सेठ को लेने के बदले देने पड़ गए, सेठ को हनुमान जी पर बहुत गुस्सा आया की उन्होंने ललन को सौ रूपये बोल के नहीं दिए, और भगवान के सामने झूठ बोला।

वह मंदिर के अंदर गया और हनुमान जी के मूर्ति को घुसा मारने लगा। घूसा मारते ही सेठ का हाथ भगवन की मूर्ति से चिपक गया। वह अपना हाथ छुड़ाने के लिए बहुत जोर लगाया, पर हाथ नहीं छूटा और ऊपर से दर्द भी देने लगा। जिसको हनुमान जी पकड़ ले वह कैसे छूट सकता हैं।

थोड़ी देर में कुछ आवाज सुनाई दिया सेठ ने ध्यान से उस आवाज को सुना। भगवान राम हनुमान जी से पूछ रहे थे की मैं जिसको सौ रूपये देने को कहा था उसको पैसा मिला की नहीं।

हनुमान जी ने कहा की महाराज पचास रूपये तो दे दिया हूँ और बाकी के पचास रूपये इस सेठ ने अपने पास रखा हैं। इसलिए मैं इसको पकड़ के रखा हूँ। अगर ये उस आदमी को पचास रूपये लौटा देगा तो मैं इसे छोड़ दूंगा।

सेठ ने सुना तो सोचा की अगर लोग मंदिर में आएंगे और मुझे इस हालत में देखेंगे तो मेरी बहुत बेइज्जती होंगी। फिर उसने हनुमान से से प्रार्थना कर बोला की प्रभु मेरे से बहुत बड़ी भूल हो गयी हैं आप मुझे आप कर दीजिये और मुझे छोड़ दीजिये।

मैं अभी उसका पचास रूपये लौटा देता हूँ। हनुमान जी ने सेठ का हाथ छोड़ दिया और सेठ ने जाकर ललन के बाकी के पचास रूपये दे दिया। ललन उस पैसे को लेकर बहुत ख़ुश हुआ और अपनी बेटी का शादी खुशी खुशी कर दिया।

सारांश – इस कहानी से हमें ये सीख मिलती है की हमें दुसरो के पैसो पे गलत नजर नहीं रखनी चाहिए। नहीं तो हमेशा लेने के देने पड़ जाते है।

3. संस्कार ( Hindi Stories For Reading )

एक बार की बात हैं। एक बहुत ही ज्ञानी संत थे। वो हमेशा एक दुसरो की मदद करते थे। एक दिन उन्होंने एक विद्यालय बनवाया । उस विद्यालय का एक प्रमुख उद्देश्य था, की उस विद्यालय में ऐसे लड़के लड़कियों का पढ़ाया जायेगा जो समाज के विकास लिए कुछ कर सके।

एक दिन उन्होंने अपने विद्यालय में वाद विवाद  प्रतियोगिता का आयोजन किया। जिसका विषय था – जीवों पर दया एवं प्राणी की सेवा! छात्रो ने जोर शोर से प्रतियोगिता में भाग लिया। फिर दूसरे दिन विद्यालय के हॉल में प्रतियोगिता को शुरू किया गया। एक छात्र ने संसाधन को लेकर बोला -हम दुसरो को तभी मदद कर सकते हैं जब हमारे पास कोई संसाधन रहेगा।

वही कुछ छात्रों की यह भी राय थी की सेवा करने के लिए संसाधन की नहीं बल्कि, अपने अंदर की भावना का होना जरुरी हैं। इसी तरह सभी प्रतिभागियों ने सेवा के विषय में अच्छा और शानदार भाषण दिए।

बाद में जब इनाम देने का समय आया तो संत ने एक विद्यार्थी को देखा जो इस प्रतियोगिता में भाग नहीं लिया था। उन्होंने उसके अपने पास बुलाया और एक अच्छा सा इनाम दिया। ये देख कर सभी छात्र – छात्राए शोर मचाने लगे।

संत ने सबको शांत कराते हुए बोले – प्यारे विद्यार्थियों! आप सभी को शिकायत यही हैं की मैंने ऐसे विद्यार्थी को इनाम क्यों दिया जो इस प्रतियोगिता में भाग नहीं लिया हैं, तो सुनो, की मैं इसको इनाम क्यों दिया।

दरअसल मैं ये जानना चाहता था की हमारे सभी विद्यार्थियों में कौन सेवाभाव का बेहतर मतलब समझता हैं। इसलिए मैंने विद्यालय के द्वार पर एक कुत्ते के घायल बच्चे को रख दिया था।

आप सभी उसी द्वार से अंदर आये लेकिन किसी ने भी उस कुत्ते के बच्चे की ओर आँख उठाकर नहीं देखा। बस एक यही एक लड़का था जिसने वहाँ रुका, उस कुत्ते के बच्चे को उठाया उसका मरहम पट्टी किया और वहाँ से ले जाकर एक सुरक्षित जगह पर छोड़ आया।

इसलिए इस इनाम का असली हकदार यही हैं इसलिए मैं इसे इनाम दे रहा हूँ। संत की बात सुनकर वहाँ मौजूद सभी छात्र छात्राएं ताली बजाने लगे।

सारांश – इस कहानी से हमें यह सिख मिलती हैं की सेवा – सहायता बस बोल देने से नहीं होता हैं। उसे कर के दिखाने से होता हैं। यह एक जीवन की कला हैं। जो अपने आचरण से शिक्षा देने का साहस न रखता हो, और वो कितना भी ज्ञानी आदमी क्यों न हो, वह पुरस्कार पाने का योग नहीं होता हैं। ( Hindi Stories For Reading )

4. बीस हजार का चक़्कर ( Hindi Stories For Reading )

एक गांव में सुंदर नाम का एक आदमी था। वह एक व्यापारी था, उसका एक कपड़ा का दुकान था। दुकान बहुत अच्छा चलता था और उससे जो कमाई होती थी वो सब लेकर के बैंक में जमा कर देता था।

एक दिन उसको कुछ पैसों की जरुरत पड़ी और वह पैसा निकालने के लिए बैंक गया। वहाँ पहुंच कर सुंदर ने एक फार्म पर एक लाख का अमाउंट भरा और कैशियर को दे दिया। कैशियर ने उसे गलती से एक लाख बीस हजार दे दिया। सुंदर ने पैसे को अपने बैग में रखा और चुपचाप वहाँ से चल दिया।

उसे पता चल गया था की कैशियर ने उसे गलती से एक लाख के बजाय एक लाख बीस हजार रूपये दे दिऐ हैं। रास्ते में सुन्दर के मन में रुपयों को लेकर ख़ुश भी हो रही थी और घबराहट भी हो रही थी।

एक बार उसके मन में आया की फालतू पैसे लौटा देता हूँ लेकिन दूसरे ही पल उसने सोचा की जब मैं अपने दुकान में ग्राहकों को गलती से ज्यादा पैसे दे देता हूँ तो कौन मुझे पैसे लौटने आते हैं।

ऐसे ही कई बार उसके मन में आता था की पैसा लौटा देता हूँ लेकिन हर बार कोई न कोई बहाना या वजह आ ही जाता था पैसे नहीं लौटने की।लेकिन इंसान के अंदर सिर्फ दिमाग़ ही नहीं इसके अलावा  दिल और आत्मा भी होता हैं जो इंसान को सही रास्ता दिखाते हैं।

दिमाग़ कह रहा था की रख लो पैसा कुछ नहीं होगा लेकिन आत्मा के अंदर से आवाज आ रही थी की तुम किसी की गलती का फायदा उठा रहे हो, और ऊपर से बेईमान न होने का ढोंग भी कर रहे हो। क्या तुम्हारा यही ईमानदारी हैं।

ये सब सोच सोचकर सुन्दर की बेचैनी और बढ़ती जा रही थी। ऐसा लग रहा था की उसका पैर आगे की तरफ बढ़ ही नहीं रहा हैं। फिर उसने एक पेड़ के निचे रुका, थोड़ा पानी पिया और अपने बैग से बीस हजार रूपये निकालकर बैंक की ओर चल दिया।

सुंदर जैसे ही बैंक की जाने लगा उसकी बेचैनी दूर होने लगी। वह खुद को हल्का और स्वस्थ महसूस करने लगा। उसके चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई थी। ऐसा लग रहा था की कोई जंग जीत कर आ रहा हैं।

सुंदर बैंक के अंदर गया और कैशियर से बोला सर अपने मुझे बीस हजार रूपये ज्यादा दे दिए थे उसको ही लौटने आया हूँ। लीजिये ये रहा आपका पैसा। कैशियर ने रूपये पाकर बहुत ख़ुश हुआ। उसने अपने जेब से एक हजार रुपया निकाला और सुंदर को देते हुए कहा- भाई साहब आपका बहुत- बहुत  धन्यवाद।

आज मेरी तरफ से अपने बच्चों के लिए मिठाई ले जाना, देखो मना मत करना। तब सुंदर बोला नहीं सर धन्यवाद तो मैं आपको दूंगा, और मिठाई भी मैं ही आप सबको खिलाऊंगा। कैशियर ने पूछा – भाई आप किस बात का धन्यवाद दे रहे हो, और किस खुशी में मिठाई खिला रहे हो।

तब सुन्दर बोला – सर धन्यवाद इस बात का की आज मुझे इस बीस हजार के चक़्कर में अपने आप को सही और गलत का पहचान करने का अवसर मिला। आपका धन्यवाद! तभी बैंक में सभी स्टॉफ खड़े होकर सुंदर के लिए ताली बजाने लगे, और वह खुशी खुशी अपने घर वापस आ गया।

सारांश – इस कहानी से हमें यह सिख मिलती हैं की हमें किसी भी चीज को लेकर के अपने मन में लोभ नहीं करना चाहिए।

 

5. किसान की घड़ी ( Hindi Stories For Reading )

रामपुर नाम का एक गांव था। उस गांव में रघु नाम का एक किसान रहता था। रघु बहुत ही मेहनती आदमी था, अपने खेतो में अनाज उगता, उसको बेचता और अपना घर चलाता था।

एक दिन रघु अपने घर में जहाँ अपना सारा अनाज रखता था, वही पर काम कर रहा था। उसने अपने हाथ में एक घड़ी पहन रखी थी. ,.. जो उसके पिता ने बड़े प्यार से उसको दिए थे। उस घड़ी से उसको बहुत ज्यादा लगाव था। रघु काम करने में इतना व्यस्त हो गया की उसकी घड़ी वही पर खो गई। वह बहुत परेशान हो गया।

उसने वह घड़ी ढूंढने की बहुत कोशिश की, उस घर का हर कोना छान मारा लेकिन उसे घड़ी कही नहीं मिली। अंत में उदास होकर घर से बाहर आ गया। बाहर आकर देखा की कुछ बच्चे खेल रहे हैं।

उसने सारे बच्चों को अपने पास बुलाया और बोला – देखो बच्चों इस घर में एक बहुत ही कीमती घड़ी खो गई है, तुमलोगो में से जो कोई मेरी घड़ी ढूंढ़ कर लाएगा उसको मैं सौ रूपये दूंगा। पैसे की लालच में बच्चे जल्दी से घर के अंदर गए और घड़ी को ढूंढ़ने लगे।

इधर उधर, यहाँ वहाँ हर जगह खोजने पर भी घड़ी नहीं मिली, बच्चे घड़ी को खोजते खोजते थक गए और घर से बाहर आकर उससे बोल दिए की घड़ी नहीं मिली। रघु ने अब अपनी घड़ी मिलने की आस खो दिया, और अपने घर के सामने उदास होकर बैठ गया।

तभी एक बच्चा वापस आया और रघु से बोला – चाचा, मैं एक बार फिर से घड़ी ढूंढ़ने की कोशिश करना चाहता हूँ। रघु बोला – हाँ क्यों नहीं, जल्दी जाओ बेटा!

बच्चा घर के अंदर गया और कुछ ही देर में घड़ी को लेकर बाहर आ गया। जब रघु ने वह घड़ी उस बच्चे के हाथ में देखा तो बहुत ख़ुश हुआ और खुशी के मारे उछलने लगा। वह सोचने लगा की जिस घड़ी को मैं नहीं ढूंढ़ पाया, इतने सारे बच्चे को नहीं मिली घड़ी। पर इस बच्चे ने कैसे घड़ी ढूंढ़ निकला।

रघु ने उससे पूछा की तुम्हे घड़ी कहा और कैसे मिली। फिर उसने बताया की घर के अंदर जाकर वह चुपचाप एक जगह पर खड़ा हो गया और शांति से घड़ी की टिक टिक की आवाज सुनने लगा। थोड़ी ही देर में वो आवाज उसे सुनाई देने लगी और उस आवाज की दिशा में गया तो उसे वह घड़ी मिल गई। रघु ने बच्चे को शाबाशी दिया और उसे सौ रूपये दिया फिर उसके घर भेज दिया।

सारांश –  इस कहानी से हमे ये शीख मिलती है की हमें जल्दबाजी करने के वजह कभी खुद को शांत रख कर भी देखना चाहिए जिससे हम वो समझ पाए जो हमारे लिए जरुरी है।

6.  उपकार का उपहार ( Hindi Stories For Reading )

रेखा के द्वारा किये गए उपकार ने आज मेरा घमंड चूर चूर कर दिया। मैं हमेशा से रेखा को गलत समझती थी। पर उसके अहसान ने आज मुझे अंदर तक झकझोर दिया। आज पहली बार मैं अपनी गलती के लिए पछता रही थी।

मुझे कभी भी रेखा तो पसंद नहीं करती थी। मैंने हमेशा से उसके खाने का मजाक उड़ाया था, नहीं ही कभी उससे सीधे मुँह बात करती थी। उसके पति की मौत काफी समय पहले हो गई थी।

उसका एक बेटा था, पर वो भी अपाहिज था, इसलिए वो अपने बेटे को अकेला छोड़कर कर कभी काम करने भी नहीं जाती थी। उसके घर की आर्थिक स्थिति बहुत ही ख़राब थी।

इसलिए तो वो हमेशा मेरे घर खाना खाने आ जाया करती थी। अक्सर घर में आ के बैठ जाती बाते करती कुछ खाने को मांगती फिर खाना खा के अपने घर चली जाती थी।

उसके रोज रोज की इस हरकत से मै तंग आ गई थी, इसलिए अब मै घर का बचा हुआ खाना कचरे में फेक दिया करती थी,  धीरे धीरे मेरे मन में उसके लिए और गुस्सा बढ़ने लगा। वो अक्सर आती और खाना मांगती, मै भी उसे गुस्से से खाना देती और उसके मुँह पे ही उसे ताना मरती मगर वो मेरे तानो को चुप चाप सहन कर लेती थी।

उसे भूख के लिए सब सहन करना पड़ता था। मै गुस्से में उसे कुछ भी बोल दिया करती थी। पर वो हमेशा ही मेरी तारीफ ही करती थी। एक बार मेरे बेटे की तबियत अचानक से खराब हो गई।

मैं अपने बेटे को ले के हॉस्पिटल गई, वहां पे डॉक्टर ने बेटे को भर्ती करने को कहा। पर उस समय मेरे पास इतने पैसे नहीं थे की मै अपने बेटे को वह भर्ती कर के इलाज करवा सकू, और मेरे पति भी ऑफिस के काम से शहर से बहार गए हुए थे।

मै तुरंत अपने घर वापस गई, और वहाँ पड़ोसियों से पैसे उधार मांगने लगी पर किसी ने भी मेरी मदद नहीं की। पर उस दिन इत्तेफाक से रेखा मेरे आ गई, वो काफी दिनों से मेरे घर नहीं आई थी, पता नहीं कैसे वो उस समय ही मेरे घर आ पहुंची।

उसे देख के मुझे और गुस्सा आने की एक तो मेरे बेटे की तबियत ख़राब है, मेरे पास पर्याप्त पैसे भी नहीं है और इसे खाने को दू। अगर आज इसने खाना माँगा मुझसे तो इसे डांट के घर से भगा दूंगी।

घर में घुसते ही उसने मेरा हाल चाल पूछा मैंने, मेरे बेटे की तबियत के बारे में उसे बता दिया। बेटे की तबियत का सुन के वो उदास हो गई और बिना कुछ कहे ही चली गई।

थोड़ी ही देर में रेखा फिर मेरे घर आई। उसने कुछ पैसे मुझे दिए, और कहा मैडम ये पैसे आप रख लो, बेटे के इलाज में काम आएंगे। ये आपके ही पैसे है, अपने आज तक इस गरीब का पेट पाला है, इन पैसो पे आपका ही हक़ है।

उसने बातो ही बातो में बताया की, भगवान की कृपा से उसका सब अच्छा चल रहा है। उसकी एक फ़ैक्ट्री में नौकरी लग गई है, इसलिए वो अब यहाँ खाना मांगने नहीं आती। वो अपने अपाहिज बेटे का इलाज भी करवा रही है, जल्द ही उसका बेटा ठीक हो जायेगा।

रेखा की इस बात ने मुझे अंदर तक झकझोर के रख दिया। मैं हमेसा इसपे इतना चिल्लाती थी, फिर भी ये मेरी मदद के लिए पैसे ले आई। मै रेखा के उपकार के सामने खुद को बहुत ही छोटा समझ रही थी।

एक एक कर के मेरे द्वारा उसके साथ किये गए बर्ताव मुझे याद आने लगे और मै खुद की नजरो में ही गिरने लगी। की जिसे मै गरीब समझ के उसको डांट दिया करती थी, उसका दिल तो मुझसे कही ज्यादा अमीर है। उसने मेरी आंखे खोल दी। रेखा के द्वारा दिए गए पैसो से मैंने अपने बेटे का इलाज करवाया। और अब मै और रेखा एक अच्छे दोस्त है।

सारांश : इस कहानी से हमें ये शीख मिलती है की कभी भी किसी से बुरा व्यवहार नहीं करना चाहिए समय सबका एक जैसा नहीं रहता है। ( Hindi Stories For Reading )

7. अपनी मदद खुद करो ( Hindi Stories For Reading )

एक गांव में एक किसान रहता था उसके पास, एक घोडा और एक गाय थी। वो अपने जानवरो को चरने के लिए जंगल में छोड़ दिया करता था। किसान के घर के बगल में ही एक धोबी का भी घर था, उस धोबी के पास एक गधा और एक बकरी थी। धोबी भी अपने जानवरो को किसान के जानवरो के साथ जंगल में चरने के लिए छोड़ देता था।

चारो जंगल में एक साथ चरते और शाम होने से पहले, एक साथ अपने अपने घर आ जाते थे। ऐसे ही चारो जानवरो में कुछ ही दिनों में दोस्ती हो गई।

उसी जंगल में एक खरगोश भी रहता था। वो इन चारो जानवरो को एक साथ चरते देखता था। उस खरगोश को जंगली कुत्तो से खतरा था, क्यों की जंगली कुत्ते अक्सर उस खरगोश को मारने के लिए दौड़ाया करते थे।

खरगोश ने सोचा क्यों ना इन चारो जानवरो से मेरी दोस्ती हो जाये तो कितना अच्छा रहेगा। इतने बड़े बड़े पशु जब मेरे दोस्त रहेंगे तो मुझे जंगली कुत्ते परेशान नहीं कर सकते, ना ही उनसे मुझे कोई खतरा होगा।

अगले दिन से खरगोश भी उन जानवरो के पास जाने लगा। जब वो अपने घास खाते तो खरगोश उनके पास ही उछलता – खूदता रहता। ऐसे ही धीरे धीरे खरगोश की दोस्ती उन चारो जानवरो से हो गई। और खरगोश अब बेफिक्र हो गया की चलो अब कुत्तो से मुझे कोई दिक्कत नहीं होगी।

ऐसे ही कुछ दिन बीते होंगे, तभी एक दिन एक कुत्ता वहां आया और खरगोश को देख के उसको काटने के लिए उसके पीछे दौड़ा। खरगोश भाग के सीधा गाय के पास गया, और गाय से बोला यह कुत्ता मुझे मारने आ रहा है मुझे आप बचाओ, गाय ने बोला। भाई तुम बहुत देर से आये हो मेरा घर जाने का समय हो गया। मेरा बछड़ा भूखा होगा मुझे जाना है।

फिर तुरंत खरगोश भाग के घोड़े के पास गया और बोला – घोड़े भाई मुझे बचाओ। ये कुत्ता मुझे जान से मार देगा। मै तुम्हारा दोस्त हूँ हम साथ में खेलते है मुझे तुम अपनी पीठ पे बैठा के यहाँ से दूर ले चलो। घोड़े ने जवाब दिया, खरगोश भाई तुम्हारी बात तो ठीक है। पर मै बैठ नहीं सकता मै हमेसा खड़े ही रहता हूँ। तुम मेरी पीठ पे बैठ जाओ वो कुत्ता तुम्हे नहीं मार पायेगा। पर बेचारा खरगोश इतना ऊपर घोड़े के पीठ पे है बैठ सकता था।

इसलिए भागते हुए गधे के पास गया और उससे बोला गधे भाई, इस कुत्ते से मेरी मदद करो –  गधा बोला अरे नहीं, मै रोज गाय और घोड़े के साथ ही अपने घर जाता हु अगर मै इनके साथ आज घर नहीं गया तो मेरा मालिक डंडा ले मुझे ढूंढते हुए यहाँ आएगा। और मुझे बहुत मरेगा, इसलिए मै यहाँ अब और देर नहीं रुक सकता।

अंत में खरगोश बकरी के पास गया, बकरी खरगोश के देखते ही उसे मना कर दी की यहाँ मेरे पास मत आओ नहीं तो ये कुत्ता मुझे भी काट लेगा। मुझे कुत्तो से बहुत डर लगता है।

निराश हो कर खरगोश वहा से भी भाग गया, भागते भागते वो एक झाड़ी में छुप गया। कुत्ता उसे बहुत ढूंढा पर उसे खरगोश नहीं मिला, जब कुत्ता वापस चला गया तब खरगोश झाड़ी से बाहर निकला, हर तरफ देखा कुत्ता नहीं दिखा तो चैन की साँस ली। और कहा की कभी भी दुसरो पे भरोशा नहीं करना चाहिए। हमेशा अपनी मदद खुद ही करनी चाहिए।

सारांश : इस कहानी से हमें ये शीख मिलती है की इंसान को कोई भी काम अपने दम पे करना चाहिए। अगर दुसरो के भरोसे रहेंगे तो निराशा ही  हाँथ लगेगी।

8. लालची मक्खियाँ ( Hindi Stories For Reading )

एक दुकान दार अपने ग्राहक को शहद दे रहा था तभी अचानक उसके हाँथ से शहद की बोतल छूट के नीचे गिर गई, और उसमे से शहद निकल के जमीन में फ़ैल गया। जितना शहद उठाया जा सकता था, उतना उस दुकानदार ने उठा लिया बाकि का वही जमीन पे गिरा रहा।

वही पे बहुत सारी मक्खियाँ उड़ रही थी। वो सब उस शहद को खाने की लालच में उस पर आ के बैठ गई। मीठा मीठा शहद उनको खाने में बहुत मजा आ रहा था, जब तक उनका पेट नहीं भरा तब वो आराम से शहद को खाने में लगी रही। जब पेट भर गया तो वो उड़ना चाही पर उड़ नहीं पाई।

उड़ने के लिए वो सब छटपटाने लगी। वो जितना छटपटाती थी उतना ही उनके पंख शहद से चिपक जाते। उनके पूरे शरीर में शहद लग गया, और बहुत सी मक्खियाँ वही मर गई।

और बहुत सी वही छटपटा रही थी। फिर भी दूसरी मक्खियाँ  वहां शहद के लालच में आती। मरी और छटपटाती मक्खियों को देख कर भी वो शहद का लालच नहीं छोड़ पाती।

वो भी दूसरी मक्खियों की तरह वही मर जाती। मक्खियों की मूर्खता को देख कर दुकान दार बोला, जो लोग जीभ के स्वाद के लालच में पड़ जाते है वे लोग भी इन मक्खियों की तरह अपने सरीर का नास कर लेते है। रोगी बन के जल्दी ही मर जाते है।

सारांश : इस कहानी से हमें ये शीख मिलती है की मनुष्य को अपने स्वाद पे संयम रखना चाहिए। स्वाद के लालच में अपने सरीर को रोगी न बनाये। ( Hindi Stories For Reading )

9. मेहनत का फल ( Hindi Stories For Reading )

एक गांव में रवि और मोहन दो दोस्त रहा करते थे। दोनों में बहुत गहरी मित्रता थी। दोनों ने पैसे कमाने का निर्णय लिया। पैसे कमाने के लिए उन्होंने एक जमीन खरीदी और उसपे खेती करने का फैसला किया।

रवि बहुत मेहनती था, और वह दिन भर खेतो में मेहनत किया करता था। जबकि मोहन एक धार्मिक लड़का था, वो दिन भर मंदिर में जा के अपनी अच्छी फसल के लिए भगवान से प्राथना किया करता था।

ऐसे ही समय बीतता गया, और देखते ही देखते एक अच्छी फसल तैयार हो गई। दोनों ने उस फसल को ले जा के बाजार में अच्छे दामों में बेच दिया। जब वो पैसे ले के अपने गावं पहुंचे।

तब रवि ने कहा इन पैसो में मुझे ज्यादा पैसा मिलना चाहिए क्यों की मैंने दिन भर खेत में मेहनत की जिसकी वजह से ये अच्छी फसल तैयार हुई है। तभी मोहन ने कहा नहीं इसमें ज्यादा पैसा मुझे मिलना चाहिए क्यों की मैंने दिन भर अच्छी फसल के लिए भगवान से प्राथना किया था। अगर मै प्राथना नहीं करता तो अच्छी फसल होना संभव ही नहीं था।

जब दोनों की बहस का कोई निष्कर्ष नहीं निकला तो, दोनों गावं के मुखिया के पास गए, और अपनी समस्या बताई। तब मुखिया ने दोनों को एक – एक बोरी चावल दिया जिसमे बहुत सारे कंकड़ थे।

फिर मुखिया ने कहा तुम दोनों इस चावल को अपने घर ले के जाओ और इनमे से  चावल और कंकड़ कल अलग करके लाना फिर मै बताऊंगा की तुम दोनों की कमाई का ज्यादा हिस्सा किसे मिलना चाहिए।

दोनों अपनी अपनी बोरी ले के वहां से चले गए। रवि बहुत मेहनती थी उसने रात भर जाग के चावल और कंकड़ को अलग कर दिया, जब की मोहन अपनी बोरी को मंदिर ले गया और वहां प्राथना करने लगा।

दूसरे दिन दोनों अपनी अपनी बोरिया ले के मुखिया के पास पहुंचे। रवि ने जो चावल और कंकड़ अलग उसे मुखिया को दिखाया। फिर मुखिया ने मोहन से मुझे तुम दिखाओ तुमने कितने कंकड़ अलग किये है।

मोहन ने कहा मुझे भगवान पे पूरा भरोसा है चावल और कंकड़ अलग हो गए होने। जब बोरी खोली गई तो चावल और कंकड़ वैसे के वैसे ही थे, फिर मुखिया ने कहा भगवान भी उसकी मदद करते है जो मेहनत करता है।

मुखिया ने रवि को कमाई का ज्यादा हिस्सा दिया। इसके बाद मोहन और रवि दोनों ही मेहनत के साथ खेत में काम करते और अच्छी फसल होती फिर दोनों उस पैसे को बराबर बराबर बाँट लेते।

सारंश : इस कहानी से हमें ये शीख मिलती है की मेहनत करना बहुत जरुरी है भगवान के भरोसे बैठने से काम नहीं होता। भगवान भी उनकी मदद करते है जो मेहनत करते है। 

10. इच्छाशक्ति और संघर्ष ( Hindi Stories For Reading )

एक छोटा सा गांव था, जहां एक निरसा में डूबा रहने वाला एक युवक रहता था। वह लोगों को देखकर अपने जीवन से निराश हो गया था और लगातार अपनी कमियों के बारे में सोचता रहता था। उसे लगता था कि वह कुछ नहीं कर सकता और अपने जीवन में कुछ अच्छा काम नहीं कर सकता।

एक दिन, उस युवक के सम्मुख एक बुजुर्ग आदमी आया और उसने उसे पूछा, “तुम्हारे जीवन का लक्ष्य क्या है?”

युवक ने उसका जवाब दिया, “मुझे नहीं पता। मेरे पास कोई लक्ष्य नहीं है।”

बुजुर्ग ने कहा, “तुम्हारे पास तो अभी भी समय है। तुम अपने लक्ष्य का चयन कर सकते हो।”

युवक ने सोचा कि बुजुर्ग सही कह रहा है। वह जीवन में कुछ करने की इच्छा रखता था, लेकिन उसे कभी भी यह सोचने का साहस नहीं हुआ था कि वह क्या करना चाहता है।

बुजुर्ग ने उसे उन लोगों के बारे में बताया जो अपने जीवन में बहुत अच्छे काम कर रहे थे। उन्होंने उसे यह भी बताया कि किसी को जीवन में सफल होने के लिए न केवल तकनीकी या ज्ञान की आवश्यकता होती है, बल्कि इच्छाशक्ति और संघर्ष की भी। यह सब कुछ उस युवक के अंदर जगाने के लिए कहा गया था।

उस दिन से, उस युवक ने एक लक्ष्य के प्रति उत्साहित हुआ। उसने अपने स्वयं के लिए और समाज के लिए कुछ करने की इच्छा प्रकट की। उसने पहले तो बच्चों को स्कूल जाने के लिए उत्साहित करने का काम शुरू किया।

फिर वह बच्चों को पढ़ाने की और उन्हें जीवन में आगे बढ़ने के लिए  मार्गदर्शन देने की कोशिश करता था। अपने काम में वह सफल रहा और उसकी इच्छाशक्ति और संघर्ष ने उसे एक सफल व्यक्ति बना दिया। उसका जीवन अब निराशा से भरा नहीं था।

अब उसकी महत्वाकांक्षा थी और वह अपने लक्ष्य की ओर बढ़ रहा था। उसने अपनी योग्यता बढ़ाने के लिए नई नई चीजों का सीखना शुरू किया। वह नए सपनों और महत्वपूर्ण लक्ष्यों की ओर बढ़ रहा था।

सारांश: इस कहानी से हम सीख सकते हैं कि सफलता के लिए इच्छाशक्ति बहुत महत्वपूर्ण होती है। इच्छाशक्ति हमें एक उद्देश्य की ओर आगे बढ़ने की शक्ति देती है और संघर्ष हमें उस उद्देश्य तक पहुँचने के लिए तैयार करता है।

अंत में, यह कहना गलत नहीं होगा कि जीवन में सफलता के लिए इच्छाशक्ति और संघर्ष अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं। हमें अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहना चाहिए और अपनी इच्छाशक्ति और संघर्ष से सफलता की ऊंचाइयों को छूना चाहिए।

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